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राज्यसभा में गूंजा ‘वंदे मातरम’, डॉ. नरेश बंसल बोले—यह भारत की आत्मा और राष्ट्र चेतना का मंत्र

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वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर सदन में विशेष चर्चा

देहरादून/नई दिल्ली। सांसद राज्यसभा एवं भाजपा राष्ट्रिय सह कोषाध्यक्ष डा. नरेश बंसल ने सदन मे वन्दे मातरम पर हो रही र्चचा मे भाग लिया। डा. नरेश बंसल ने सदन मे कहा कि वन्दे मातरम भारत की आत्मा है। डा. नरेश बंसल ने कहा कि वंदे मातरम के 150 वीं वर्षगांठ पर मैं बंकिम बाबू और सभी स्वतंत्रता के उन नौजवानों को जिन्होंने फांसी के फंदों को हंसते-हंसते चूमा और वंदे मातरम का गान करते हुए अपने हार्दिक श्रंद्धाजली अर्पित करता हूं। उन्होने वंदे मातरम के संबंध में अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि “है वंदे मातरम माघ छठी के शुभ अवसर पर 150वीं पूर्ति विषय पर जन्मदिवस के पुण्य क्षणों में स्वागत है वंदन है जागरण गीत तुम्हारा अभिनंदन है।”

डा. नरेश बंसल ने कहा कि “वंदे मातरम ये बंकिम बाबू की एक रचना मात्र नहीं आनंदमठ का प्रेरक अध्याय हैै। यह पृष्ठ है अतीत के गौरव का, राष्ट्र के विराट वैभव का स्वाधीनता के संघर्ष का, भारत के उत्कर्ष का। यह केवल एक गीत नही वंदन है पावन माटी का, चंदन है पावन माटी का, संदर्भ है अपनी परिपाठी का, यह जननी का अमर गान है, स्वत्व की पहचान है यह मंत्र है उस चेतना का जो क्रांतिवीरों के मन मे हुंकार बनकर गूंजता था, प्रत्येक देशवासी अर्चक बन इसे पूजता था, सुनो मेरे इतिहास के स्वर्णिम अतीत तुम साक्षी हो उस त्याग और तप के, उस सतत संघर्ष के जो कहता है गुलामी नहीं वह संघर्ष का काल था। शहीदी आन, बान, शान असंख्य अमर बलिदान जो निरंतर अविराम है अदृश्य शिलापट पर जिनके नाम है, किंतु आज मां का कौन वो लाल है जो मातृ वंदना के विरोध में खडा है। जिसकी आंखों पर स्वार्थ का आवरण जला है। कौन है जो निज विरासत को पहचानता नहीं, परंपरा संस्कृति को जानता नहीं, हम भारतवासी ही नहीं, भारत मां के पुत्र हैं यदि हम सुपात्र हैं तो देश के लिए जियेंगे यही संकल्प मात्र है। इसलिए मुक्तकंठ से कहें, वंदे मातरम।। यह भारत मां की अराधना है, पीडियों की साधना है वंदे मातरम राष्ट्र चेतना का मंत्र है, इसकी प्रेरणा से भारत स्वतंत्र है बस यह मंत्र है, मंत्र है मंत्र है” ऐसी सुंदर पंक्तियो के माध्यम से सदन मे डा. नरेश बंसल ने वन्दे मातरम का गुणगान किया।

डा. नरेश बंसल ने आगे कहा कि आज 150वीं वर्षगांठ पर इस भारतीय संसद में वंदे मातरम गीत पर चर्चा चिंतन का शुुभ अवसर है इस शब्दों के साथ श्रद्धांजली देते हुए मैं यह कहना चाहता हूं कि वंदे मातरम 1875 में लिखा गया 1896 में बाबू रवींद्रनाथ टैगोर ने इसको संगीतबद्ध किया, गाया 1882 में इसने आनंदमठ में इसने स्थान पाया। यह स्वाधीनता आंदोलन में इसकी भूमिका रही, 1905 में बंग-बंग आंदोलन के दौरान में यह गीत राष्ट्रीय जागरण का प्रमुख प्रतीक बना, उस समय जूलूसों, सभाओं और आंदोलन में वंदे मातरम का उद्घोष ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर बना।

डा. नरेश बंसल ने कहा कि मुझे सौभाग्य मिला स्वर्ण जयंती भी इसकी मनाने का, जिस समय स्वर्ण जयंती थी 1975 में देश में आपातकाल था, सभायें करने की अनमुति नहीं थी, मैं उस समय काॅलेज छात्र था, विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता था। अनुमति मांगी गयी सभा करने की वंदे मातरम की स्वर्ण जयंती के लिए, अनुमति नहीं मिली, एक अन्य संस्था का वाणी परिषद का गठन करके हम कुछ कार्यकर्ताओं ने वंदे मातरम की जयंती मनायी, उस समय सभी स्वर्ण जयंती के अवसर पर वंदे मातरम कहकर अभी लोग कह रहे थे कि आपका स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान है मैं बताना चाहता हूं कि जिस समय स्वतंत्रता पर डाका आपने डाला, आपातकाल लगाकर देश को जेलखाना बनाया, सबको जेलों में डाला, कोई अपील नहीं , कोई दलील नहीं कोई पत्रिका में छप नहीं सकता था, तब भी उस समय हमने वंदे मातरम कहकर आपके उस तानाशाही रवैये के खिलाफ जेलों को भरने का काम किया और आपको मजबूर किया कि आप आपातकाल हटायें, लोकतंत्र सेनानियों ने इस काम को करके वंदे मातरम के साथ अपने आपको बताया आपने देश को किस प्रकार से तोडने का काम किया, तुष्टिकरण के लिए छुपते चले गये अगर आपने उस समय कांग्रेस का कार्यकर्ता उस गीत को गा रहा था और अध्यक्षता करने वाले नवाब अली जौहर उसको बीच में छोडकर चले गये कमेटी बनी अगर आप उस समय नहीं झुके होते तो मैं कह सकता हूं कि भारत मां का बंटवारा नहीं होता क्योंकि आपने समझौता किया।

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