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बदलते दौर में बच्चों की डिजिटल मॉनिटरिंग माता-पिता की सर्वोच्च जिम्मेदारी- कुसुम कंडवाल
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बदलते दौर में बच्चों की डिजिटल मॉनिटरिंग माता-पिता की सर्वोच्च जिम्मेदारी- कुसुम कंडवाल

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​सोशल मीडिया और मोबाइल का अनियंत्रित उपयोग बच्चों को धकेल रहा गलत दिशा में, महिला आयोग ने जताई चिंता

​अभिभावक रखें पैनी नजर; बच्चा कितनी देर और फोन पर क्या चला रहा है, यह जानना बेहद जरूरी

​देहरादून। उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने आधुनिक युग में बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा को लेकर अभिभावकों की भूमिका पर विशेष चिंता व्यक्त की है। अंतर्राष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस के अवसर पर जारी अपने संदेश में उन्होंने अपील करते हुए कहा है कि आज का समय बहुत ही सतर्कता और ध्यान रखने का समय है। वर्तमान दौर में तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी साबित हो रही है। सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के अनियंत्रित उपयोग के माध्यम से हमारे नौनिहाल और युवा पीढ़ी बहुत तेजी से गलत दिशा की ओर भटक रहे हैं, जिसका फायदा समाज के असामाजिक और आपराधिक तत्व उठा रहे हैं।

​उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में ऐसे कई मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जिनमें यह जानकारी मिलती है कि बच्चा घर से कहीं चला गया है, भटक गया है या किसी गलत रास्ते पर निकल पड़ा है। इन सभी मामलों की गहराई से जांच करने पर प्रमुखता से यही तथ्य निकलकर सामने आता है कि बच्चा सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय था और वहां किसी अजनबी या गलत व्यक्ति के संपर्क में था। ऐसे में नासमझी और कम उम्र के कारण बच्चे किसी के भी बहकावे में आकर कोई भी गलत कदम उठा ले रहे हैं। इस प्रकार की बढ़ती घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं और इन्हें रोकने के लिए पारिवारिक स्तर पर प्रयास होने अनिवार्य हैं।

​अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने अभिभावकों से मार्मिक अपील करते हुए कहा कि इस डिजिटल युग में माता-पिता की यह विशेष और गंभीर संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों की निरंतर और कड़ाई से मॉनिटरिंग (निगरानी) अवश्य करें। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि केवल बच्चों को फोन दे देना ही काफी नहीं है, बल्कि यह देखना सबसे अनिवार्य है कि बच्चा दिनभर में कितनी देर फोन चला रहा है, वह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किस प्रकार की सामग्री (कंटेंट) देख रहा है और सोशल मीडिया के माध्यम से किन लोगों के संपर्क में है। आज के समय में बच्चों की संगति और उनकी डिजिटल गतिविधियों पर पैनी नजर रखना ही उन्हें सुरक्षित रखने का एकमात्र जरिया है।

​उन्होंने सचेत करते हुए कहा कि इंटरनेट की आभासी दुनिया में ऐसे कई लोग सक्रिय हैं जो बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाकर उनका मानसिक, शारीरिक या आर्थिक दुरुपयोग कर सकते हैं, जिससे बच्चों को अपूरणीय हानि हो सकती है। ऐसे में माता-पिता का जागरूक होना और बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना बेहद जरूरी है। आयोग की अध्यक्ष ने आह्वान किया कि आइए हम सब मिलकर अपने बच्चों को एक भयमुक्त और सुरक्षित परिवेश दें, लेकिन साथ ही उनके स्क्रीन टाइम (फोन चलाने के समय) को नियंत्रित कर उन्हें इस अदृश्य खतरे से बचाएं। बच्चों का सही मार्गदर्शन और उनकी सही मॉनिटरिंग ही एक सशक्त और सुरक्षित भविष्य की नींव रखेगी।

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