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युवाओं में बढ़ता दिल का खतरा, वैज्ञानिकों ने खोजा उपाय, जोखिम पहले ही बताएगा ब्लड टेस्ट

युवाओं में बढ़ता दिल का खतरा, वैज्ञानिकों ने खोजा उपाय, जोखिम पहले ही बताएगा ब्लड टेस्ट

Heart Disease: तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच हृदय रोग अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रह गए हैं। हाल के वर्षों में युवाओं, यहां तक कि 30 साल से कम उम्र के लोगों में भी दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अनियमित दिनचर्या, तनाव और गलत खानपान के साथ-साथ कुछ मामलों में आनुवांशिक कारण भी हृदय रोगों के खतरे को चुपचाप बढ़ा देते हैं, जिसकी समय रहते पहचान करना बेहद जरूरी है।

इसी दिशा में वैज्ञानिकों को एक अहम सफलता मिली है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसे ब्लड टेस्ट की पहचान की है, जो दिल की एक गंभीर आनुवांशिक बीमारी के जोखिम का पहले ही संकेत दे सकता है। यह खोज खासतौर पर हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी (HCM) जैसी समस्या से जुड़े मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण मानी जा रही है।

क्या है हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी?

हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी दिल की मांसपेशियों से जुड़ी एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें हृदय की दीवारें असामान्य रूप से मोटी हो जाती हैं। इससे दिल को खून पंप करने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। यह बीमारी अक्सर परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और कई बार शुरुआती चरण में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते।

इस बीमारी से पीड़ित लोगों को सांस फूलना, सीने में दर्द, चक्कर आना या अचानक बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है और अचानक कार्डियक अरेस्ट का खतरा बढ़ जाता है।

अब ब्लड टेस्ट से मिलेगा खतरे का संकेत

अब तक इस बीमारी की पहचान के लिए इकोकार्डियोग्राम, ईसीजी और जेनेटिक टेस्ट का सहारा लिया जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इन तरीकों से यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि किन मरीजों को सबसे अधिक खतरा है। इसी कमी को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास ब्लड टेस्ट पर काम किया है।

हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि खून में मौजूद एक विशेष प्रोटीन NT-Pro-BNP का स्तर हृदय पर पड़ने वाले दबाव को दर्शा सकता है। इस प्रोटीन का अधिक स्तर यह संकेत देता है कि दिल सामान्य से अधिक मेहनत कर रहा है।

अध्ययन में क्या सामने आया?

शोध के दौरान करीब 700 HCM मरीजों के ब्लड सैंपल का विश्लेषण किया गया। जिन मरीजों में NT-Pro-BNP का स्तर अधिक पाया गया, उनमें दिल की संरचना में बदलाव, स्कार टिश्यू बनने और भविष्य में हार्ट फेलियर या एट्रियल फाइब्रिलेशन जैसी समस्याओं का खतरा ज्यादा देखा गया।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ब्लड टेस्ट की मदद से उच्च जोखिम वाले मरीजों की पहचान पहले ही की जा सकेगी, जिससे उनकी नियमित निगरानी और समय पर इलाज संभव होगा।

विशेषज्ञों की राय

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की कार्डियोवैस्कुलर जेनेटिक्स विशेषज्ञ प्रोफेसर कैरोलिन हो के अनुसार, यह टेस्ट डॉक्टरों को यह तय करने में मदद कर सकता है कि किन मरीजों को अधिक गहन इलाज और निगरानी की जरूरत है। इससे जानलेवा स्थितियों को समय रहते रोका जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की जांच से मरीजों को अपनी जीवनशैली में सुधार करने और हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने का मौका भी मिलेगा।

(साभार)

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